महापौर के बयानों से कटघरे में नगर निगम: सिस्टम लाचार या नेतृत्व की नाकामी.?
रतलाम में नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर अब खुद महापौर के बयानों से ही गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जब शहर की व्यवस्था संभालने और अधिकारियों से समय पर काम करवाने की मुख्य जिम्मेदारी स्वयं महापौर की है, तो ऐसे में 'सिस्टम लाचार' होने का बयान अपने आप में कई बड़े असमंजस पैदा करता है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह सिस्टम किसके द्वारा बनाया गया है और इसे सुचारू रूप से चलाने की कमान किसके हाथों में है। यदि अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन ठीक से नहीं कर रहे हैं, तो क्या यह माना जाए कि महापौर अपने ही अमले से काम निकलवाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।
ट्रिपल इंजन सरकार के दावों की जमीनी हकीकत: शहर में फेल होती दिख रही है सरकार
राज्य से लेकर स्थानीय निकाय तक मची राजनीतिक हलचल के बीच रतलाम की बदहाल तस्वीर यह साफ बयां कर रही है कि यहां 'ट्रिपल इंजन की सरकार' भी पूरी तरह फेल होती हुई दिखाई दे रही है। जब केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर एक ही सत्ता का पहरा होने का दावा किया जाता है, तब जनता को विकास और त्वरित समाधान की उम्मीद होती है, लेकिन इसके विपरीत प्रशासनिक लाचारी सामने आ रही है। सिस्टम की नाकामी का ठीकरा केवल अधिकारियों के सिर पर फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। शहरवासियों को कोरे बयानों या आश्वासनों से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि उन्हें धरातल पर ठोस परिणाम और राहत चाहिए।
कुर्सी सिर्फ अधिकार नहीं, जवाबदेही तय करती है: जनता को बहानों से नहीं समाधान से मतलब
रतलाम की जागरूक जनता अब यह सीधे तौर पर जानना चाहती है कि क्या नगर निगम का पूरा प्रशासनिक ढांचा सचमुच महापौर के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो चुका है या फिर यह प्रशासनिक अकुशलता को छिपाने का एक जरिया मात्र है। व्यवस्थाएं जब पूरी तरह से सत्ता के हाथ में हों, तब इस तरह की लाचारी जनता के साथ सरासर छलावा है। बयान चाहे जो भी दिए जाएं, लेकिन जवाबदेही से किनारा नहीं किया जा सकता, क्योंकि सत्ता की कुर्सी केवल विशेषाधिकार और श्रेय लेने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह जनता के प्रति जवाबदेही और कड़े फैसले लेने का दायित्व भी तय करती है।