हाट की चौकी: 'चाय की टपरी' पर पुलिसिया कार्यप्रणाली की चर्चा, अपराधी की 'खातिरदारी' और आमजन को 'धमकी',खबर दिखाने ओर शिकायत करने पर पत्रकार पर हमला हाट चौकी प्रभारी का दोहरा रवैया: रक्षक या भक्षक..?

Posted By: Rafik Khan
7/6/2026

हाट की चौकी: 'चाय की टपरी' पर पुलिसिया कार्यप्रणाली की चर्चा, अपराधी की 'खातिरदारी' और आमजन को 'धमकी',खबर दिखाने ओर शिकायत करने पर पत्रकार पर हमला दोहरा रवैया: रक्षक या भक्षक..?

रतलाम, हाट की चौकी इलाके में इन दिनों स्थानीय पुलिस चौकी की कार्यशैली क्षेत्रवासियों के बीच चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। चाय की चुस्कियों के साथ लोग चौकी के जिम्मेदारों के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठा रहे हैं। आरोप है कि एक तरफ जहां आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को चौकी में संरक्षण और पनाह दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर आम और बेकसूर नागरिकों को बलपूर्वक सड़कों पर डराया-धमकाया जा रहा है। इलाके में अवैध गतिविधियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं, और इसके बावजूद तंत्र अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है।

दबंग का 'दरबार' , पुलिस की कलम पर 'सिफारिश' का पहरा
चाय की टपरियों पर हो रही चर्चाओं की मानें तो इस चौकी पर एक रसूखदार दबंग शख्स का सिक्का चलता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस शख्स की हरी झंडी के बिना किसी आम नागरिक की फरियाद तक नहीं सुनी जाती। यहाँ तक कि एफआईआर दर्ज करने से पहले भी पुलिस की कलम इस दबंग की इजाजत का इंतजार करती है। हैरानी की बात यह है कि इस व्यक्ति के खिलाफ इसी थाने में कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन मजबूत राजनीतिक संबंधों के कारण पुलिस उसके सामने नतमस्तक है। चौकी पर आते ही उसके लिए गद्दीदार कुर्सी बिछाई जाती है। बिना किसी 'विशेष लाभ' के पुलिस द्वारा की जा रही यह खातिरदारी और इसी शख्स को बीच में रखकर होने वाले तथाकथित 'समझौतों' को लेकर अब उंगलियां उठने लगी हैं।

दिखावे के सीसीटीवी और आला अधिकारियों के दावों को ठेंगा
चौकी की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरे महज एक 'रस्म अदायगी' बनकर रह गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें केवल किसी बड़ी दुर्घटना के वक्त सबूत जुटाने के लिए ही देखा जाएगा। एक तरफ जहां जिले के उच्च अधिकारी एसपी अमित कुमार, सीएसपी सत्येंद्र घनघोरिया और डीडी नगर थाना प्रभारी अनुराग यादव अपराध नियंत्रण के लिए आधी-आधी रात तक सड़कों पर उतरकर खुद व्यवस्थाओं का जायजा ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ, चौकी के जिम्मेदार रात के अंधेरे में अपराधियों से सांठगांठ कर अवैध व्यवसायों और गतिविधियों को बढ़ावा देने में जुटे हैं।

पूर्व और वर्तमान कानून व्यवस्था में जमीन-आसमान का अंतर
इलाके के लोग उस दौर को भी याद कर रहे हैं जब डीडी नगर थाना प्रभारी अनुराग यादव खुद चौकी प्रभारी हुआ करते थे। उनके कार्यकाल में अपराधियों के हौसले इतने पस्त थे कि वे चौकी की तरफ रुख करने से भी कतराते थे और आपराधिक ग्राफ में भारी गिरावट आई थी। इसके विपरीत, हालफा़िलहाल में अपराधियों का स्वागत-सत्कार किया जा रहा है। आला अधिकारियों को पूरी तरह अंधेरे में रखकर मिलीभगत का यह खेल धड़ल्ले से जारी है। सजग पाठक इस इशारे को बखूबी समझ सकते हैं।

संवैधानिक अधिकार और पत्रकारिता का धर्म
नोट: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के अधिकार के अंतर्गत मीडिया को जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने और जनता तक जानकारी पहुँचाने का पूर्ण अधिकार है। इसी दायित्व का निर्वहन करते हुए इस विषय को रेखांकित किया गया है। इस समाचार का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था पर कोई अंतिम निर्णय थोपना नहीं है, बल्कि लोकहित में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए जनता के बीच उठ रहे सवालों को सामने लाना है।

कहानी अभी बाकी है...
इस रिपोर्ट में शामिल सभी बातें स्थानीय चर्चाओं, दावों और नागरिकों द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। 'तेज़ इंडिया टीवी' पर जल्द ही इस मामले की अगली कड़ी में, दावों के पार जाकर तथ्यों के साथ पूरी सच्चाई उजागर की जाएगी।



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